प्रताप सिंह सिंघवी: सात बार विधायक, वसुंधरा राजे सरकार में मंत्री और राजस्थान की ग्रामीण राजनीति के अनुभवी चेहरों में एक

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तेजस्वी सिंह इंडिया प्राइम जयपुर। राजस्थान की राजनीति में कुछ गिनेचुने नेता है जिन्हें राजनीति की लम्बी पारी खेलने का अनुभव है। ऐसे नेताओ की पहचान किसी एक पद या एक चुनाव से नहीं बनती। उनका राजनीतिक व्यक्तित्व कई दशकों के संघर्ष, संगठन, चुनावी जीत-हार और जनता के बीच लगातार सक्रिय रहने से तैयार होता है। प्रताप सिंह सिंघवी ऐसे ही नेताओं में शामिल हैं।

18 फरवरी 1957 को बारां जिले के छीपाबड़ौद में जन्मे सिंघवी ने राजनीति की शुरुआत उस दौर में की, जब देश की राजनीति बड़े बदलावों से गुजर रही थी। वर्ष 1974-75 में देश में जेपी आंदोलन का प्रभाव था और युवा वर्ग बड़ी संख्या में राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ रहा था। इसी दौर में सिंघवी की छात्र राजनीति में सक्रियता बढ़ी।

उनके राजनीतिक जीवन से जुड़े विवरणों के अनुसार, छात्र जीवन में उन्होंने युवाओं को संगठित करने और स्थानीय समस्याओं को लेकर सक्रिय भूमिका निभाई। आपातकाल के दौर में भी छात्र राजनीति और लोकतांत्रिक गतिविधियों पर लगे प्रतिबंधों के बीच युवा कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही। सिंघवी के समर्थकों और पुराने राजनीतिक साथियों के अनुसार, उस दौर ने उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया।

हालांकि, आपातकाल के दौरान उनकी भूमिगत गतिविधियों और उस समय की विशिष्ट घटनाओं से जुड़े दावों को प्रकाशित करते समय प्रत्यक्षदर्शियों या समकालीन दस्तावेजों से पुष्टि करना उचित होगा।

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1977 का दौर और युवा राजनीति

1977 का चुनाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ था। आपातकाल के बाद देश में सत्ता परिवर्तन हुआ और जनता पार्टी के पक्ष में व्यापक राजनीतिक माहौल बना।

सिंघवी उस समय युवा राजनीति से जुड़े हुए थे। उनके पुराने साथियों के अनुसार, उन्होंने छबड़ा और आसपास के ग्रामीण इलाकों में युवाओं के बीच सक्रियता दिखाई और राजनीतिक जागरूकता बढ़ाने में भूमिका निभाई।आज के दौर की तरह उस समय सोशल मीडिया नहीं था। चुनाव प्रचार का आधार व्यक्तिगत संपर्क, छोटी सभाएं, पैदल यात्राएं और गांव-गांव जाकर लोगों से मिलना था।

1985 के विधानसभा चुनाव तक आते-आते सिंघवी की क्षेत्रीय राजनीतिक पहचान मजबूत हो चुकी थी। उनके बारे में स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जाता है कि उन्होंने अपने शुरुआती चुनावी दौर में ग्रामीण इलाकों में साइकिल और पैदल घूमकर लोगों से संपर्क किया।यह दौर उनकी राजनीति की उस शैली को समझने में मदद करता है, जिसमें व्यक्तिगत जनसंपर्क और संगठन को महत्वपूर्ण माना गया।

28 साल की उम्र में पहली बार विधायक

वर्ष 1985 में प्रताप सिंह सिंघवी पहली बार छबड़ा विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। उस समय उनकी उम्र करीब 28 वर्ष थी।यह जीत उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव थी।

इसके बाद 1993, 1998 और 2003 में भी उन्होंने छबड़ा से जीत दर्ज की। 2008 में उन्हें कांग्रेस के करण सिंह से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 2013 में उन्होंने फिर वापसी की।इसके बाद 2018 और 2023 में भी उन्होंने जीत दर्ज की।इस तरह वे अब तक सात बार छबड़ा से विधायक चुने जा चुके हैं।

उनकी पूरी चुनावी राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपना विधानसभा क्षेत्र नहीं बदला। लगातार एक ही क्षेत्र से चुनाव लड़ना और कई दशकों तक वहां राजनीतिक आधार बनाए रखना उनकी जमीनी पकड़ का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।

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एक चुनावी हार और फिर मजबूत वापसी

2008 का चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का एक अलग अध्याय था।लगातार चुनाव जीतने के बाद उन्हें कांग्रेस के करण सिंह के हाथों हार मिली। लेकिन इस हार के बाद उन्होंने राजनीति से दूरी नहीं बनाई।2013 में उन्होंने वापसी की और फिर 2018 तथा 2023 में लगातार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे।

2023 में निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार उन्हें 65,000 वोट मिले और उन्होंने कांग्रेस के करण सिंह को 5,108 मतों से हराया।एक चुनाव में हार के बाद दोबारा जीत हासिल करना बताता है कि उनका राजनीतिक आधार केवल सत्ता या पद पर निर्भर नहीं रहा।

भाजपा संगठन से सरकार तक

प्रताप सिंह सिंघवी का राजनीतिक अनुभव केवल विधानसभा चुनावों तक सीमित नहीं है।उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा, राजस्थान में उपाध्यक्ष के रूप में काम किया। भाजपा राजस्थान की प्रदेश कार्यकारिणी में भी उनकी भूमिका रही।

संगठन के बाद उन्हें सरकार में काम करने का अवसर मिला।वसुंधरा राजे सरकार में उन्होंने कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। इनमें नगरीय विकास एवं आवासन, स्वायत्त शासन, कार्य, युवा मामले एवं खेल तथा वन एवं पर्यावरण जैसे विभाग शामिल रहे।

मंत्री के रूप में काम करने के दौरान उन्हें प्रशासनिक व्यवस्था और सरकारी विभागों के कामकाज को करीब से समझने का अवसर मिला।यही अनुभव बाद के वर्षों में उनकी विपक्षी राजनीति में भी दिखाई दिया।

 

गहलोत सरकार के दौरान विपक्ष में मुखर भूमिका

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2018 में राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने। इस दौरान भाजपा विधायक के रूप में प्रताप सिंह सिंघवी विपक्ष की राजनीति में सक्रिय रहे।उन्होंने विधानसभा और सार्वजनिक मंचों पर सरकार को कई मुद्दों पर घेरा।

भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही, किसान समस्याएं, कानून-व्यवस्था और हाड़ौती क्षेत्र से जुड़े विषय उनके प्रमुख मुद्दों में रहे।मंत्री रह चुके होने के कारण उन्हें सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली की समझ थी। इसलिए उनके सवाल कई बार विभागीय निर्णयों, टेंडर प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े होते थे।

मिड-डे मील योजना को लेकर गंभीर आरोप

जून 2023 में सिंघवी ने मिड-डे मील योजना से जुड़े टेंडर को लेकर गंभीर आरोप लगाए।मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने आरोप लगाया कि महिला एवं बाल विकास विभाग और कॉनफैड से जुड़े एक टेंडर की प्रक्रिया में अनियमितता हुई और कथित तौर पर एक साल के करीब 1,000 करोड़ रुपये के टेंडर को पांच साल तक बढ़ाकर लगभग 7,500 करोड़ रुपये का किया गया।

उन्होंने मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की।यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि 7,500 करोड़ रुपये का आंकड़ा सिंघवी द्वारा लगाए गए आरोप का हिस्सा था। इसे न्यायिक या जांच एजेंसी द्वारा प्रमाणित घोटाले के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।लेकिन विपक्षी राजनीति के दृष्टिकोण से यह महत्वपूर्ण था कि उन्होंने चुनाव से पहले सरकार की पारदर्शिता और टेंडर प्रक्रिया पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए।

भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जवाबदेही

विपक्ष में रहते हुए सिंघवी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा।उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और आम नागरिकों को सरकारी तंत्र में काम कराने के लिए प्रभावशाली लोगों या बिचौलियों पर निर्भर होना पड़ रहा है।उन्होंने अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और अभियोजन स्वीकृति जैसे विषयों पर भी सवाल उठाए।उनकी राजनीति का मूल तर्क यह रहा कि सरकार केवल योजनाओं की घोषणा करने तक सीमित न रहे, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था को जवाबदेह भी बनाए।

हाड़ौती के किसान और ग्रामीण समस्याएं

छबड़ा और बारां क्षेत्र की राजनीति में किसान हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दा रहे हैं।सिंघवी ने लहसुन और सोयाबीन किसानों की समस्याओं को उठाया। फसल खराब होने के बाद मुआवजा, सरकारी खरीद, बाजार में उचित मूल्य और किसानों को राहत जैसे विषयों पर उन्होंने सरकार को घेरा।हाड़ौती क्षेत्र में खाद की उपलब्धता और ग्रामीण इलाकों में बिजली की समस्या भी उनके राजनीतिक मुद्दों में शामिल रही।इन मुद्दों का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि बारां और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर कृषि पर निर्भर है।

कानून-व्यवस्था पर सरकार से सवाल

विपक्ष के दौरान सिंघवी ने कानून-व्यवस्था को लेकर भी तत्कालीन सरकार पर निशाना साधा।महिलाओं और दलितों के खिलाफ अपराध तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस व्यवस्था जैसे मुद्दों को उन्होंने विधानसभा और सार्वजनिक मंचों पर उठाया।उनका आरोप रहा कि सरकार अपराध नियंत्रण और प्रशासनिक जवाबदेही के मोर्चे पर अपेक्षित रूप से प्रभावी नहीं रही।यह विपक्ष के एक वरिष्ठ नेता के रूप में उनकी भूमिका का हिस्सा था।

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सत्ता और विपक्ष दोनों का अनुभव

प्रताप सिंह सिंघवी के राजनीतिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि उन्होंने सत्ता और विपक्ष दोनों की राजनीति को करीब से देखा है।

वे स्वयं सरकार में मंत्री रहे हैं। उन्होंने प्रशासनिक निर्णय लिए हैं और विभागों की जिम्मेदारी संभाली है।

बाद में विपक्ष में रहते हुए उन्होंने उसी प्रशासनिक व्यवस्था से सरकार को जवाबदेह बनाने की कोशिश की।

यही दोहरा अनुभव उन्हें राजस्थान की राजनीति के अनुभवी नेताओं में अलग स्थान देता है।

हाड़ौती की राजनीति की गहरी समझ

चार दशक से अधिक समय तक छबड़ा से जुड़े रहने के कारण सिंघवी ने हाड़ौती की ग्रामीण राजनीति को बहुत करीब से देखा है।

उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक दौर देखे हैं।

उन्होंने भाजपा के संगठन को मजबूत होते देखा।

उन्होंने कांग्रेस सरकारों के दौर में विपक्ष की भूमिका निभाई।

उन्होंने भाजपा सरकार में मंत्री के रूप में प्रशासन चलाया।

और उन्होंने अपनी सीट पर चुनावी हार के बाद वापसी भी की।

इस लंबे अनुभव ने उन्हें केवल एक विधानसभा क्षेत्र का नेता नहीं बनाया, बल्कि राजस्थान की राजनीति के बदलते सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों का अनुभवी पर्यवेक्षक भी बनाया।

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बिना तड़क-भड़क के लंबी राजनीतिक पारी

आज की राजनीति में जहां नेता अक्सर सोशल मीडिया और लगातार प्रचार के माध्यम से अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं, वहीं सिंघवी की राजनीति का आधार लंबे समय से संगठन और व्यक्तिगत जनसंपर्क रहा है।

उनकी पहचान किसी एक बड़ी राजनीतिक घोषणा से नहीं, बल्कि लंबे समय तक लगातार सक्रिय रहने से बनी है।

उनके समर्थक उन्हें ऐसा नेता मानते हैं जो क्षेत्रीय समस्याओं को सीधे प्रशासन और सरकार के सामने रखने में विश्वास करता है।

उनकी राजनीतिक शैली में तड़क-भड़क की अपेक्षा संगठन और क्षेत्रीय संपर्क को अधिक महत्व दिखाई देता है।

भाजपा के लिए अनुभव की बड़ी पूंजी

प्रताप सिंह सिंघवी के पास राजस्थान की राजनीति का एक ऐसा अनुभव है जो कई दशकों में तैयार हुआ है। छात्र राजनीति से लेकर संगठन तक।

संगठन से विधानसभा तक।

विधानसभा से सरकार तक।

सरकार से विपक्ष तक।

और विपक्ष से फिर विधानसभा में लगातार वापसी तक।

यह पूरा सफर उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को व्यापक बनाता है।

आज भाजपा में नई पीढ़ी के नेताओं के उभरने के बीच सिंघवी जैसे वरिष्ठ नेताओं का अनुभव पार्टी के लिए उपयोगी हो सकता है।

उनके पास हाड़ौती की राजनीति की समझ है।

ग्रामीण राजस्थान की सामाजिक संरचना की जानकारी है।

सरकार चलाने का अनुभव है।

विपक्ष में सरकार को घेरने का अनुभव है।

और विधानसभा की समितियों में काम करने का लंबा अनुभव भी है।

निष्कर्ष: संघर्ष से सत्ता और विपक्ष तक

प्रताप सिंह सिंघवी की राजनीतिक कहानी केवल सात चुनाव जीतने की कहानी नहीं है।यह उस पीढ़ी के नेता की कहानी है जिसने छात्र राजनीति से शुरुआत की, राजनीतिक आंदोलनों का दौर देखा, संगठन में काम किया, कम उम्र में विधायक बना, कई बार चुनाव जीता, एक बार हार के बाद वापसी की, सरकार में मंत्री रहा और विपक्ष में रहते हुए सरकार से जवाब मांगा।

1970 के दशक की छात्र राजनीति से शुरू हुआ यह सफर आज भी जारी है।उनकी राजनीति में संघर्ष भी रहा है, सत्ता भी रही है और विपक्ष का तेवर भी।

चार दशक से अधिक समय बाद भी वे सक्रिय हैं।और शायद यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान है—एक ऐसा नेता जिसने राजनीति को केवल पद के रूप में नहीं, बल्कि लंबे सार्वजनिक जीवन के रूप में जिया है।

राजस्थान की राजनीति में आगे उनकी भूमिका क्या होगी, यह भविष्य तय करेगा। लेकिन इतना निश्चित है कि सात बार विधायक, पूर्व मंत्री और चार दशक से अधिक के राजनीतिक अनुभव वाले प्रताप सिंह सिंघवी के पास राजस्थान की राजनीति का वह अनुभव है, जिसे किसी भी राजनीतिक दल के लिए नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

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