मेयर कौन बनेगा: जयपुर समेत राजस्थान में किसके सिर सजेगा शहर की सत्ता का ताज?
इंडिया प्राइम टीवी | राजस्थान डेस्क राजस्थान के नगर निकाय चुनाव में मतदान पूरा हो चुका है और अब 14 सितंबर को आने वाले नतीजों का इंतजार है। जयपुर में 150 वार्डों के लिए मतदान के बाद करीब 63 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ है। लेकिन चुनावी प्रक्रिया का एक दिलचस्प राजनीतिक अध्याय अभी बाकी है। जनता ने पार्षद चुनने के लिए वोट दिया है, अब इन नतीजों के बाद राजनीतिक दलों के सामने अगला सवाल होगा—मेयर कौन बनेगा और उपमेयर की कुर्सी किसके हिस्से आएगी?
जयपुर में इस बार मेयर पद का आरक्षण नहीं है। यानी यह पद अनारक्षित है और परिणाम आने के बाद राजनीतिक दलों के पास अपने संभावित चेहरे को आगे बढ़ाने की व्यापक गुंजाइश होगी। यही वजह है कि अभी से मेयर पद को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज होना स्वाभाविक है।
जनता ने पार्षद चुने, लेकिन शहर का चेहरा कौन तय करेगा?
निकाय चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक गणित यही है कि मतदाता सीधे मेयर का चुनाव नहीं कर रहा है। पहले 150 वार्डों के पार्षद सामने आएंगे और उसके बाद निगम की सत्ता का नेतृत्व तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इसलिए 14 सितंबर को केवल BJP और कांग्रेस की कितनी सीटें आईं, यह देखना पर्याप्त नहीं होगा।
असली सवाल होगा—किसके पास मेयर बनाने के लिए पर्याप्त संख्या और राजनीतिक समर्थन है?
यदि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलता है तो मेयर का चुनाव अपेक्षाकृत सरल हो सकता है। लेकिन यदि BJP और कांग्रेस के बीच सीटों का अंतर कम रहा और निर्दलीय या अन्य दलों के उम्मीदवार निर्णायक संख्या में जीत गए, तो मेयर की कुर्सी के लिए राजनीतिक बातचीत और रणनीति का महत्व अचानक बढ़ जाएगा।
जयपुर में बदला हुआ राजनीतिक नक्शा भी महत्वपूर्ण
2026 का जयपुर नगर निगम चुनाव पुराने चुनावों से पूरी तरह अलग राजनीतिक और प्रशासनिक संरचना में हुआ है। 2020 में जयपुर को दो नगर निगमों—ग्रेटर और हेरिटेज—में बांटा गया था और कुल वार्डों की संख्या 250 थी। अब व्यवस्था फिर बदलकर एक नगर निगम और 150 वार्डों की हो गई है। इसी नई व्यवस्था में जयपुर के मेयर पद को अनारक्षित रखा गया है।
इसलिए 2026 का परिणाम सीधे 2020 के आंकड़ों से तुलना करने के बजाय नए 150-वार्ड वाले राजनीतिक नक्शे के आधार पर पढ़ना होगा।
BJP के सामने सबसे बड़ी चुनौती—जीत के बाद चेहरा कौन?
सत्तारूढ़ BJP के लिए मेयर का चुनाव केवल एक स्थानीय पद का सवाल नहीं होगा। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और पार्टी संगठन ने निकाय चुनाव में व्यापक स्तर पर अभियान चलाया है। ऐसे में यदि BJP को स्पष्ट बहुमत मिलता है तो पार्टी के सामने सबसे पहले यह तय करने का सवाल आएगा कि मेयर के लिए किस चेहरे को आगे किया जाए।
यहां पार्षद की स्थानीय लोकप्रियता के साथ संगठन में उसकी पकड़, पार्टी नेतृत्व से संबंध और जयपुर की अलग-अलग राजनीतिक पट्टियों में स्वीकार्यता भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
यानी चुनाव जीतने के बाद BJP के भीतर एक दूसरा चुनाव शुरू होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता—पार्षदों में से किसे शहर का राजनीतिक चेहरा बनाया जाए?
कांग्रेस के लिए मेयर की लड़ाई सिर्फ कुर्सी नहीं, वापसी का संकेत होगी
कांग्रेस के लिए तस्वीर दूसरी होगी। यदि पार्टी 150 में मजबूत संख्या हासिल करती है तो मेयर पद उसके लिए जयपुर की राजनीति में वापसी का बड़ा प्रतीक बन सकता है। लेकिन यदि BJP और कांग्रेस के बीच अंतर बहुत कम रहा तो कांग्रेस को अपने पार्षदों को एकजुट रखने और संभावित सहयोगियों के साथ राजनीतिक समीकरण बनाने की जरूरत पड़ सकती है।
ऐसी स्थिति में चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस के भीतर भी यह सवाल महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी का स्थानीय चेहरा कौन है और किस नेता के पास पार्षदों को साथ रखने की क्षमता है?
निर्दलीय बन सकते हैं असली Kingmaker
इस चुनाव का सबसे दिलचस्प परिणाम उस स्थिति में सामने आएगा जब दोनों प्रमुख दल बहुमत से दूर रहेंगे।
ऐसी स्थिति में निर्दलीय पार्षद अचानक सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक खिलाड़ी बन सकते हैं। चुनाव के दौरान जिन नेताओं को पार्टी का टिकट नहीं मिला और जिन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, उनके परिणामों पर खास नजर रहेगी।
अगर ऐसे उम्मीदवार जीतकर आते हैं तो 14 सितंबर के बाद सवाल बदल जाएगा।
किसने कितने वार्ड जीते? से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा—किसके पास कितने अतिरिक्त पार्षद हैं और मेयर बनाने के लिए किसका समर्थन किसे मिल सकता है?
उपमेयर की कुर्सी भी बनेगी सौदेबाजी का हिस्सा
मेयर के साथ उपमेयर का पद भी राजनीतिक समीकरण में महत्वपूर्ण होगा। यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत है तो दोनों पदों पर पार्टी नेतृत्व का नियंत्रण अपेक्षाकृत आसान होगा। लेकिन करीबी मुकाबले में उपमेयर का पद भी समर्थन जुटाने और राजनीतिक संतुलन बनाने का माध्यम बन सकता है।
यही वजह है कि 14 सितंबर को परिणाम आने के बाद केवल मेयर पद के दावेदारों की चर्चा नहीं होगी। कौन सा पार्षद किस गुट में है, किसकी संगठन में पकड़ है और कौन संभावित रूप से निर्णायक भूमिका निभा सकता है—यह पूरा गणित सामने आएगा।
राजस्थान के दूसरे बड़े शहरों में भी यही सवाल
यह कहानी केवल जयपुर तक सीमित नहीं है। राजस्थान के दूसरे बड़े नगर निगमों में भी चुनाव के बाद मेयर पद का राजनीतिक गणित सामने आएगा। 11 सितंबर के दूसरे चरण में जयपुर के साथ जोधपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर और पाली जैसे बड़े शहरों में भी मतदान हुआ। राज्य में कुल 10 नगर निगमों में मेयर पदों को लेकर अलग-अलग आरक्षण व्यवस्था लागू की गई है।
इसलिए परिणाम के बाद राजस्थान की शहरी राजनीति को दो स्तरों पर पढ़ना होगा—पहला, किस पार्टी को कितने पार्षद मिले, और दूसरा, किस पार्टी के पास शहर का मेयर बनाने की वास्तविक ताकत आई।
पांच साल की राजनीति का सवाल
मेयर का सवाल केवल अगले कुछ दिनों की राजनीतिक हलचल नहीं है। नगर निकाय का सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। इसलिए जिस दल या नेता के हाथ में निगम का नेतृत्व आएगा, उसके सामने अगले पांच वर्षों के लिए शहर की शहरी व्यवस्था, बजट, विकास योजनाओं, सफाई, सड़क, पार्किंग, यातायात, भवन अनुमति और स्थानीय प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक जिम्मेदारी होगी।
यही कारण है कि मेयर का चुनाव परिणाम आने के बाद होने वाली औपचारिक प्रक्रिया भर नहीं होगा। यह अगले पांच वर्षों की स्थानीय सत्ता का पहला बड़ा संकेत होगा।
अब 14 सितंबर पर रहेगी नजर
जयपुर में मतदान पूरा हो चुका है और अब 14 सितंबर को 150 वार्डों के परिणाम सामने आएंगे। इसके बाद चुनाव का अगला सवाल बिल्कुल साफ होगा—
किसके पास कितने पार्षद हैं?
फिर उससे बड़ा सवाल होगा—
किसके पास मेयर बनाने के लिए जरूरी राजनीतिक ताकत है?
और यदि मुकाबला करीबी रहा तो तीसरा सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होगा—
कौन-कौन से पार्षद Kingmaker बन सकते हैं?
इसलिए जयपुर नगर निगम चुनाव की कहानी 14 सितंबर को खत्म नहीं होगी। वास्तव में उस दिन से मेयर और उपमेयर की पांच साल की सत्ता का असली राजनीतिक अध्याय शुरू होगा।






