जयपुर का अगला मेयर कौन? BJP के सामने जातीय समीकरण
इंडिया प्राइम टीवी जयपुर। नगर निगम चुनाव का मतदान खत्म हो चुका है और अब जयपुर की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल पार्षदों के जीत-हार से आगे निकलकर अगला मेयर कौन बनेगा? पर टिक गया है। जयपुर में 11 सितंबर को मतदान हुआ और 14 सितंबर को परिणाम सामने आएंगे। इसके बाद निर्वाचित पार्षदों के बीच मेयर पद के लिए असली राजनीतिक मुकाबला शुरू होगा। इस बार खास बात यह है कि जयपुर में मेयर का पद सामान्य वर्ग के लिए खुला है, इसलिए भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने किसी भी सामाजिक वर्ग के चेहरे को आगे करने की गुंजाइश है।
जयपुर में मेयर का चुनाव केवल पार्षदों की संख्या का गणित नहीं है। पिछले वर्षों का इतिहास बताता है कि पार्टी के पास बहुमत होने के बावजूद मेयर की कुर्सी हमेशा उसी चेहरे को नहीं मिली जिसे संगठन ने पहले से तय माना हो। 2019 में इसका सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिला था, जब भाजपा के बागी पार्षद विष्णु लाटा ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार को हरा दिया था। लाटा बाद में कांग्रेस के समर्थन से मेयर बने।
यही कारण है कि इस बार भाजपा चुनाव परिणाम से पहले ही अपने पार्षद प्रत्याशियों को एकजुट रखने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने प्रत्याशियों को कैंप में रखने का फैसला किया है। राजनीतिक रूप से इसका संदेश साफ है—पार्षदों की संख्या जितनी महत्वपूर्ण होगी, उससे कम महत्वपूर्ण नहीं होगा कि चुनाव के बाद वे किसके साथ खड़े होते हैं।
जयपुर में मेयर की कुर्सी का 32 साल का इतिहास क्या कहता है?
जयपुर नगर निगम के 32 साल के इतिहास में 13 महापौर रह चुके हैं। उपलब्ध रिकॉर्ड में वैश्य और गुर्जर समुदाय का प्रतिनिधित्व सबसे ज्यादा दिखाई देता है, जबकि ब्राह्मण समुदाय से भी मेयर रहे हैं। यानी यह कहना सही नहीं होगा कि जयपुर में कभी ब्राह्मण मेयर नहीं बना; बल्कि बड़ा सवाल यह है कि हाल के राजनीतिक दौर में भाजपा ने मेयर पद के लिए ब्राह्मण चेहरे पर कितना भरोसा किया है।
यहीं से 2026 का चुनाव एक नए राजनीतिक सवाल को जन्म देता है—क्या भाजपा इस बार सामाजिक संतुलन के लिए ब्राह्मण चेहरे पर दांव लगा सकती है?
इसकी संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके लिए केवल जातीय समीकरण पर्याप्त नहीं होगा। संभावित मेयर को पार्षदों के बीच स्वीकार्यता, पार्टी संगठन का भरोसा और शीर्ष नेतृत्व की सहमति—तीनों हासिल करने होंगे।
विष्णु लाटा की कहानी इस बार क्यों महत्वपूर्ण है?
2019 का विष्णु लाटा प्रकरण इस चुनाव के लिए सिर्फ इतिहास नहीं बल्कि एक राजनीतिक चेतावनी भी है।
उस समय भाजपा के पास नगर निगम में मजबूत स्थिति थी, लेकिन पार्टी के भीतर असंतोष और क्रॉस-वोटिंग ने पूरा समीकरण बदल दिया। विष्णु लाटा ने भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार को हराया और कांग्रेस के समर्थन से मेयर बने।इस बार भाजपा शायद उसी गलती को दोहराना नहीं चाहती। प्रत्याशियों की बाड़ेबंदी को इसी नजर से देखा जा रहा है।
इसलिए 14 सितंबर की मतगणना के बाद जयपुर में तीन आंकड़े सबसे महत्वपूर्ण होंगे—
भाजपा के कितने पार्षद जीतते हैं?
कांग्रेस के कितने पार्षद आते हैं?
और निर्दलीयों की संख्या कितनी रहती है?
क्योंकि यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो निर्दलीय पार्षद मेयर चुनाव के किंगमेकर बन सकते हैं। चुनाव में रिकॉर्ड 63.55 प्रतिशत मतदान हुआ है और राजनीतिक विश्लेषण में निर्दलीयों को भी संभावित समीकरण बदलने वाली ताकत माना जा रहा है।
BJP के सामने सबसे बड़ा सवाल—पुराना चेहरा या नया प्रयोग?
भाजपा ने जयपुर में इस बार कई ऐसे नेताओं और पार्षद प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है जिनके बारे में मेयर पद के संभावित दावेदार के तौर पर चर्चा है। इनमें पूर्व मेयर ज्योति खंडेलवाल और पार्टी संगठन से जुड़े सुनील कोठारी जैसे नाम सामने आए हैं।लेकिन मेयर चुनाव में एक दूसरा मॉडल भी भाजपा के सामने हो सकता है—ऐसा नया चेहरा जिसे चुनाव से पहले मेयर पद का सबसे बड़ा दावेदार न माना जा रहा हो।
भाजपा यदि बहुमत के करीब पहुंचती है तो पार्टी के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प ऐसा पार्षद हो सकता है जो संगठन के प्रति वफादार हो, विवादों से अपेक्षाकृत दूर हो और अलग-अलग सामाजिक समूहों के पार्षदों में स्वीकार्य हो।यानी इस बार सवाल केवल यह नहीं होगा कि कौन लोकप्रिय है, बल्कि यह होगा कि कौन 150 सदस्यीय निगम में सबसे ज्यादा राजनीतिक स्वीकार्यता बना सकता है।
क्या ब्राह्मण चेहरा बन सकता है BJP का मास्टरस्ट्रोक?
जयपुर की राजनीति में यह सवाल अब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मेयर पद सामान्य वर्ग के लिए खुला है।यदि भाजपा को मजबूत बहुमत मिलता है और उसके निर्वाचित पार्षदों में कोई प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरा सामने आता है, तो पार्टी के लिए यह सामाजिक संतुलन का विकल्प हो सकता है।
लेकिन इसे अभी prediction से आगे ले जाना जल्दबाजी होगी।ब्राह्मण कार्ड तभी प्रभावी होगा जब उस समुदाय का कोई पार्षद संगठन, स्थानीय राजनीति और निर्वाचित पार्षदों के बीच पर्याप्त स्वीकार्यता रखता हो।
इसलिए जाति अकेली निर्णायक नहीं होगी—जाति + संगठन + पार्षदों की स्वीकार्यता + नेतृत्व की पसंद मिलकर अंतिम नाम तय करेंगे।
कांग्रेस के लिए क्या संभावना?
कांग्रेस के लिए पहला लक्ष्य मेयर का चेहरा तय करना नहीं बल्कि पर्याप्त पार्षद जुटाना होगा। यदि भाजपा स्पष्ट बहुमत से दूर रहती है तो कांग्रेस के पास निर्दलीयों के साथ बातचीत करके मेयर चुनाव को दिलचस्प बनाने का मौका होगा।2019 का इतिहास बताता है कि जयपुर में मेयर चुनाव को केवल पार्टी के आधिकारिक आंकड़ों से नहीं पढ़ा जा सकता। विष्णु लाटा का चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
इसलिए कांग्रेस के लिए भी भाजपा के भीतर असंतोष या संभावित बागी धड़े पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
Prediction: किसका मेयर?
पहली संभावना — BJP का मेयर:
यदि भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलता है तो मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा का मेयर बनना सबसे मजबूत संभावना होगी। राज्य में भाजपा की सरकार है और पार्टी अपने पार्षदों को चुनाव परिणाम से पहले ही संगठित रखने की कोशिश कर रही है।
दूसरी संभावना — BJP का नया चेहरा:
भाजपा यदि पुराने राजनीतिक चेहरों के बजाय संगठन के भरोसे वाले नए पार्षद को आगे करती है तो यह सबसे बड़ा surprise हो सकता है।
तीसरी संभावना — ब्राह्मण चेहरा:
यदि भाजपा के पास पर्याप्त संख्या में प्रभावशाली ब्राह्मण पार्षद आते हैं और पार्टी सामाजिक प्रतिनिधित्व का संदेश देना चाहती है, तो ब्राह्मण मेयर की संभावना इस बार पहले से ज्यादा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण दिखाई देती है।
चौथी संभावना — निर्दलीयों का खेल:
यदि भाजपा और कांग्रेस के बीच संख्या का अंतर कम रहा तो निर्दलीय पार्षद अचानक सबसे महत्वपूर्ण हो जाएंगे। ऐसे में 2019 का विष्णु लाटा मॉडल फिर से चर्चा में आ सकता है।
निष्कर्ष: जयपुर का अगला मेयर कौन?
आज की स्थिति में सबसे मजबूत prediction भाजपा के मेयर की है, लेकिन नाम बताना अभी जल्दबाजी होगी।
असल लड़ाई 14 सितंबर के परिणाम के बाद शुरू होगी। भाजपा के पास यदि स्पष्ट बहुमत आता है तो पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए नाम चुनना अपेक्षाकृत आसान होगा। लेकिन यदि बहुमत कुछ सीटों से दूर रहा तो निर्दलीय, क्रॉस-वोटिंग और व्यक्तिगत राजनीतिक समीकरण पूरे खेल को बदल सकते हैं।
और यहीं 2019 का विष्णु लाटा अध्याय फिर महत्वपूर्ण हो जाता है।
जयपुर में इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि BJP का मेयर बनेगा या कांग्रेस का। असली सवाल है—BJP का मेयर बना तो वह कौन होगा: पुराना चेहरा, संगठन का नया सिपाही या ऐसा ब्राह्मण चेहरा जो जयपुर के लंबे सामाजिक प्रतिनिधित्व के समीकरण को बदल दे?
14 सितंबर के नतीजे इस सवाल का पहला जवाब देंगे, लेकिन अंतिम जवाब पार्षदों के बीच होने वाली मेयर की वोटिंग में मिलेगा।






