Google Trends: दुनिया में भुखमरी का संकट गहराया: 26.6 करोड़ लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा की चपेट में, संयुक्त राष्ट्र ने जारी की चेतावनी
Google Trends: इंडिया प्राइम इंटरनेशनल डेस्क। दुनिया एक बार फिर बड़े खाद्य संकट की ओर बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र की दो प्रमुख एजेंसियों — खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) — ने चेतावनी दी है कि जून से नवंबर 2026 के बीच दुनिया के 13 संकटग्रस्त क्षेत्रों में भुखमरी और खाद्य असुरक्षा की स्थिति और गंभीर हो सकती है। संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 26.6 करोड़ लोग पहले से ही गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं और यदि तत्काल वैश्विक हस्तक्षेप नहीं हुआ तो लाखों लोग अकाल जैसी स्थिति के करीब पहुंच सकते हैं।
किन देशों में सबसे अधिक खतरा?
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में सूडान, दक्षिण सूडान, गाजा पट्टी, यमन, सोमालिया और नाइजीरिया को सबसे गंभीर जोखिम वाले क्षेत्रों में रखा गया है। इनके अलावा अफगानिस्तान, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, म्यांमार, हैती, माली, लेबनान और मेडागास्कर भी उच्च जोखिम वाले देशों की सूची में शामिल हैं।
इन देशों में लाखों लोग संघर्ष, विस्थापन, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक संकट और कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं के कारण भोजन की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं।
दुनिया में भूख का नया भूगोल
संयुक्त राष्ट्र की नवीनतम रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक भूख अब कुछ चुनिंदा संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में केंद्रित होती जा रही है। दुनिया के कुल गंभीर खाद्य संकट से जूझ रहे लोगों में से लगभग दो-तिहाई सिर्फ 10 देशों में रहते हैं।
इन देशों में शामिल हैं:
- सूडान
- दक्षिण सूडान
- यमन
- अफगानिस्तान
- नाइजीरिया
- कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य
- म्यांमार
- पाकिस्तान
- बांग्लादेश
- सीरिया
विशेषज्ञों का मानना है कि भूख अब केवल गरीबी की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह संघर्ष, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक असमानता का संयुक्त परिणाम बन चुकी है।
संघर्ष और युद्ध क्यों बन रहे हैं सबसे बड़ा कारण?
FAO और WFP के अनुसार, भुखमरी का सबसे बड़ा कारण युद्ध और हिंसा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि अधिकांश प्रभावित क्षेत्रों में लंबे समय से चल रहे संघर्षों ने खेती, व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है।
गाजा, सूडान और यमन जैसे क्षेत्रों में:
- कृषि भूमि नष्ट हो रही है।
- खाद्यान्न आपूर्ति बाधित है।
- लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं।
- मानवीय सहायता पहुंचाना कठिन होता जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन और अल नीनो का बढ़ता असर
संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि अल नीनो और अन्य चरम मौसम घटनाएं पहले से कमजोर खाद्य प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं। सूखा, बाढ़ और असामान्य वर्षा उत्पादन को प्रभावित कर रहे हैं।
पूर्वी अफ्रीका, साहेल क्षेत्र और दक्षिण एशिया में जलवायु परिवर्तन के कारण:
- फसल उत्पादन घट रहा है।
- पशुधन को नुकसान पहुंच रहा है।
- खाद्य कीमतों में वृद्धि हो रही है।
- जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।
दुनिया में कितना भोजन पैदा होता है और फिर भी लोग भूखे क्यों हैं?
संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न शोध संस्थानों के अनुसार, दुनिया में इतनी खाद्य सामग्री का उत्पादन होता है कि पूरी वैश्विक आबादी की जरूरतें पूरी की जा सकें। समस्या उत्पादन की कमी नहीं, बल्कि वितरण और पहुंच की है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- दुनिया में उत्पादित कुल भोजन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा बर्बाद हो जाता है।
- अमीर देशों में अत्यधिक खपत और खाद्य अपव्यय जारी है।
- गरीब देशों में लोग भोजन खरीदने की क्षमता खो रहे हैं।
- संघर्ष और आपूर्ति बाधाओं के कारण भोजन जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाता।
वित्तपोषण में भारी गिरावट
संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती धन की कमी है। रिपोर्ट के अनुसार, 2022 के बाद से खाद्य सहायता और मानवीय कार्यक्रमों के लिए उपलब्ध वित्तपोषण में लगभग 59 प्रतिशत की कमी आई है।
हालांकि, अमेरिका ने हाल ही में WFP को 80 करोड़ डॉलर की सहायता देने की घोषणा की है, जिससे 37 देशों में 3.8 करोड़ से अधिक लोगों को मदद मिल सकेगी। इसके बावजूद 2026 के लिए WFP की अरबों डॉलर की सहायता अपील अब भी पूरी नहीं हो सकी है।
बच्चों पर सबसे गंभीर असर
वैश्विक खाद्य संकट का सबसे अधिक प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है।
2025 के दौरान:
- 3.55 करोड़ से अधिक बच्चे तीव्र कुपोषण से प्रभावित हुए।
- इनमें लगभग एक करोड़ बच्चे गंभीर कुपोषण की श्रेणी में थे।
कुपोषण के कारण बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की उत्पादकता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।
भारत और दुनिया के लिए क्या हैं संकेत?
भारत ने पिछले वर्षों में खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), मुफ्त राशन योजना और डिजिटल वितरण तंत्र ने करोड़ों लोगों को सहायता पहुंचाई है।
फिर भी वैश्विक खाद्य संकट का भारत पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है:
- खाद्य तेल और उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव
- कृषि निर्यात और आयात में अस्थिरता
- जलवायु परिवर्तन के कारण घरेलू उत्पादन पर असर
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आपातकालीन खाद्य सहायता पर्याप्त नहीं होगी। दीर्घकालिक समाधान के लिए जरूरी है:
- संघर्षों का शांतिपूर्ण समाधान
- कृषि में निवेश
- जलवायु अनुकूल खेती
- खाद्य अपव्यय में कमी
- गरीब देशों के लिए वित्तीय सहायता
निष्कर्ष
दुनिया आज एक विरोधाभास का सामना कर रही है। एक ओर वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर करोड़ों लोग भोजन की बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी स्पष्ट है — यदि दुनिया ने अभी कार्रवाई नहीं की, तो आने वाले महीनों में कई क्षेत्रों में अकाल जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। भूख केवल मानवीय संकट नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
