पीएम मोदी की विदेश यात्राएं: 101 यात्राएं, 81 देश, और भारत को व्यापार में क्या फायदा हुआ

देवेन्द्र सिंह इंडिया प्राइम टीवी I पीएम मोदी की विदेश यात्राएं: 101 यात्राएं, 81 देश, और भारत को व्यापार में क्या फायदा हुआ. 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, और उसी साल जून में भूटान की उनकी पहली विदेश यात्रा ने एक ऐसा सिलसिला शुरू किया जो आज तक किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के यात्रा रिकॉर्ड से आगे निकल गया है। जून 2026 तक, मोदी 101 अंतरराष्ट्रीय यात्राएं करके 81 देशों की यात्रा कर चुके हैं यह संख्या उनसे पहले के किसी भी प्रधानमंत्री से कहीं अधिक है।
लेकिन सिर्फ यात्राओं की गिनती से ज्यादा कुछ पता नहीं चलता। ज्यादा अहम सवाल यह है — और इस लेख में हम इसी का जवाब सरकारी आंकड़ों के आधार पर देने की कोशिश कर रहे हैं, न कि किसी राजनीतिक दावे के आधार पर — कि इन यात्राओं के साथ-साथ भारत के व्यापार, निवेश और अर्थव्यवस्था में वास्तव में क्या बदला, और क्या नहीं बदला।
2014 बनाम 2026: बड़े आंकड़े एक नज़र में
यात्राओं की बात करने से पहले, सरकारी और रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के आधार पर बुनियादी तस्वीर देख लें:
- केंद्रीय बजट (कुल खर्च): 2014-15 में लगभग 17.95 लाख करोड़ रुपये → 2026-27 में 53.47 लाख करोड़ रुपये — यानी बारह साल में नॉमिनल रूप से लगभग तीन गुना बढ़ोतरी।
- कुल निर्यात (वस्तुएं + सेवाएं): 2013-14 में लगभग 466 अरब डॉलर → 2025-26 में लगभग 860 अरब डॉलर, वाणिज्य मंत्रालय और RBI के आंकड़ों के अनुसार।
- कुल आयात: 2024-25 में लगभग 915 अरब डॉलर (नवीनतम पूर्ण वर्ष का आंकड़ा), जो भारत की बढ़ती ऊर्जा और सोने की आयात ज़रूरतों को भी दिखाता है।
- FDI प्रवाह: 2013-14 में 36.05 अरब डॉलर → 2024-25 में 81.04 अरब डॉलर। 2014-25 के बीच कुल मिलाकर भारत को 748.78 अरब डॉलर का FDI मिला, जो पिछले ग्यारह वर्षों (2003-14) में मिले 308.38 अरब डॉलर से 143% ज्यादा है।
ये पूरी अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़े हैं, जिन्हें कई कारण प्रभावित करते हैं — कच्चे तेल की कीमतें, कोविड महामारी, घरेलू सुधार, रुपये की कीमत — सिर्फ विदेश यात्राएं नहीं। लेकिन यही वह बैकग्राउंड है जिसके बीच ये यात्राएं हुईं, और किसी एक यात्रा को किसी व्यापार आंकड़े के लिए सीधे ज़िम्मेदार ठहराने से पहले इसे ध्यान में रखना ज़रूरी है।
पीएम मोदी ने वास्तव में कितनी बार यात्रा की है?
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के अपने प्रकाशित यात्रा रिकॉर्ड के अनुसार, मोदी ने पहले कार्यकाल (2014-19) में 49 विदेश यात्राएं और दूसरे कार्यकाल (2019-24) में 27 यात्राएं की, बाकी यात्राएं मौजूदा कार्यकाल में हुई हैं — जिससे जून 2026 तक कुल संख्या 101 हो गई है। कोविड महामारी के कारण उन्होंने 2020 में कोई विदेश यात्रा नहीं की।
सबसे ज्यादा गए गंतव्य भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं की कहानी खुद बताते हैं: फ्रांस और अमेरिका — दोनों में वे 10-10 बार गए हैं, जबकि जापान और UAE में वे 8-8 बार गए हैं। उनके नाम कई “पहली बार” का रिकॉर्ड भी है — इज़राइल (2017), मंगोलिया (2015), यूक्रेन (2024) और स्लोवाकिया (2026) जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री, और फिलिस्तीन (2018) जाने वाले एकमात्र प्रधानमंत्री। एक अहम कमी भी है: वे कभी उत्तर कोरिया नहीं गए, और भारत के लिए व्यापार या तकनीक की दृष्टि से अहम कुछ अन्य देश भी अभी तक अनदेखे हैं।
इन यात्राओं पर सरकार ने कितना खर्च किया?
यह सवाल संसद में बार-बार उठता रहा है। विदेश मंत्रालय द्वारा लोकसभा और राज्यसभा में दिए गए लिखित जवाबों के अनुसार, 2015 से 2025 के बीच भारत ने प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर लगभग 762 करोड़ रुपये खर्च किए। इसके अलावा, अलग-अलग समय सीमा के लिए भी आंकड़े सामने आए हैं — जैसे मई 2022 से दिसंबर 2024 के बीच की 38 यात्राओं पर लगभग 258 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट में सरकारी आंकड़ों के हवाले से बताया गया।
यह स्पष्ट करना ज़रूरी है: ये आंकड़े अलग-अलग संसदीय सवालों से आए हैं, जो अलग-अलग समय सीमा को कवर करते हैं, इसलिए इनको जोड़कर एक “कुल जीवनकाल खर्च” नहीं निकाला जा सकता — और विपक्ष ने समय-समय पर इन यात्राओं की लागत और उनसे मिले फायदे पर सवाल भी उठाए हैं। यह कहानी का एक वाजिब हिस्सा है, कोई हाशिये की बात नहीं।
सबसे ज्यादा गए गए देश — और उनसे जुड़ी व्यापार की कहानी
अमेरिका: भारत और अमेरिका के बीच वस्तुओं का व्यापार 2023-24 में 119.71 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिससे यह भारत का सबसे बड़ा द्विपक्षीय व्यापार संबंध बना हुआ है — फिर भी भारत-अमेरिका के बीच अभी तक कोई पूर्ण फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) नहीं है, और 2025 में अमेरिका द्वारा लगाए गए नए टैरिफ ने निर्यात वृद्धि को कुछ समय के लिए धीमा भी किया।
जापान: जापान के साथ व्यापार लगातार बढ़ा है, जिसकी एक बड़ी वजह लंबे समय से चल रहा इंफ्रास्ट्रक्चर सहयोग (जैसे मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना) और एक फ्री ट्रेड व्यवस्था है जो 2014 से पहले की है लेकिन उसके बाद और गहरी हुई है।
UAE: आंकड़ों में यह सबसे साफ “पहले बनाम बाद” की कहानी है। द्विपक्षीय व्यापार 2013 के लगभग 67 अरब डॉलर से घटकर 2016 में 49.3 अरब डॉलर पर आ गया था। 2018 की एक यात्रा के दौरान भारत और UAE ने स्थानीय करेंसी में व्यापार तय करने का समझौता किया। इसके बाद 2022 में हुए कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA) ने भारत के 90% से ज्यादा निर्यात पर टैरिफ घटा दिया। वाणिज्य मंत्रालय के बयानों के अनुसार, इसके बाद द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के पार चला गया — 2024-25 में 100.03 अरब डॉलर और 2025-26 में 101.25 अरब डॉलर।
एशिया, अफ्रीका और यूरोप: क्षेत्र-वार नज़र
एशिया (खाड़ी देश और दक्षिण-पूर्व एशिया): UAE के अलावा, भारत ने 2015 में आसियान-इंडिया फ्री ट्रेड एरिया लागू किया और खाड़ी देशों के साथ रिश्ते गहरे किए हैं — UAE वाला मॉडल अब भारत अन्य खाड़ी व मध्य एशियाई देशों के साथ भी दोहराने की कोशिश कर रहा है।
अफ्रीका: वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, भारत-अफ्रीका द्विपक्षीय व्यापार 2019-20 के 56 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 100 अरब डॉलर के पार चला गया, जिससे भारत चीन और यूरोपीय संघ के साथ अफ्रीका के टॉप व्यापारिक साझेदारों में शामिल हो गया। 1996-2024 के बीच अफ्रीका में भारत का संचयी निवेश 75 अरब डॉलर से ज्यादा है, और सरकार का लक्ष्य 2030 तक इस व्यापार को दोगुना करना है।
यूरोप: यूरोपीय आयोग के अपने व्यापार आंकड़ों के अनुसार, भारत-EU के बीच वस्तुओं का व्यापार पिछले दशक में 83.7% बढ़ा है, जो 2025 में लगभग 118 अरब यूरो तक पहुंच गया। भारत में EU का FDI स्टॉक 2021 के 105.1 अरब यूरो से बढ़कर 2024 में 132.8 अरब यूरो हो गया। इसमें सबसे बड़ी और ताज़ा खबर यह है: भारत और EU ने 27 जनवरी 2026 को एक लंबे समय से अटके फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत पूरी कर ली — यह डील 2007 से, यानी मोदी के सत्ता में आने से भी पहले से, बीच-बीच में चर्चा में थी, लेकिन आख़िरकार उनके कार्यकाल में पूरी हुई।
आंकड़े क्या नहीं बताते
एक संतुलित तस्वीर के लिए यह भी देखना ज़रूरी है कि क्या नहीं बदला, या किस दिशा में बदला नहीं जिस दिशा की उम्मीद थी:
- व्यापार घाटा भी बढ़ा है, सिर्फ निर्यात नहीं। डॉलर के हिसाब से आयात भी लगभग उसी रफ्तार से बढ़े हैं जितने निर्यात — खासकर सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और कच्चे तेल की वजह से — यानी व्यापार घाटे का अंतर खुद कम नहीं हुआ है।
- कई बड़े संबंध अभी भी अनसुलझे हैं। भारत-अमेरिका के बीच अभी कोई FTA नहीं है, और भारत 2019 में रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (RCEP) से बाहर हो गया था, चीनी आयात बढ़ने की चिंता के कारण — यह फैसला आज भी बहस का विषय है।
- कारण बताना वास्तव में कठिन है। व्यापार और FDI में वृद्धि वैश्विक पूंजी प्रवाह, घरेलू सुधारों (GST, PLI योजनाएं, ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस में बदलाव) और करेंसी की चाल से भी जुड़ी है, सिर्फ कूटनीतिक यात्राओं से नहीं। यात्राएं और व्यापार समझौते अक्सर साथ-साथ होते हैं, लेकिन समय का मिलना सबूत नहीं है कि एक दूसरे का कारण है।
निष्कर्ष
आंकड़ों के हिसाब से: भारत का निर्यात लगभग दोगुना हुआ, FDI प्रवाह दोगुने से ज्यादा बढ़ा, और कई लंबे समय से अटके व्यापार समझौते (UAE CEPA, EU FTA) उस दौर में पूरे हुए जब प्रधानमंत्री ने अपने किसी भी पूर्ववर्ती से ज्यादा यात्राएं कीं। क्या इन यात्राओं ने व्यापार में यह बढ़त लाई, या ये साथ-साथ चलीं, या सिर्फ बड़े आर्थिक सुधारों के साथ संयोग से एक ही समय पर हुईं — यह एक वाजिब सवाल है, और सिर्फ यह डेटा इसका पूरा जवाब नहीं दे सकता। जो स्पष्ट है वह यह है कि दोनों तरफ के मुख्य आंकड़े — यात्राएं और व्यापार — असली और सत्यापित योग्य हैं, और इन्हें अलग-अलग देखने के बजाय साथ में देखना ज्यादा समझदारी होगी।
स्रोत (Sources)
- प्रधानमंत्री कार्यालय, भारत — विदेश/घरेलू यात्राओं का विवरण
- विकिपीडिया — नरेंद्र मोदी की अंतरराष्ट्रीय यात्राओं की सूची
- द फेडरल — भूटान से स्लोवाकिया तक: पीएम मोदी की 100 विदेश यात्राएं
- PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च — यूनियन बजट 2025-26 विश्लेषण और यूनियन बजट 2026-27 विश्लेषण
- प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो, भारत सरकार — निर्यात के नए रिकॉर्ड, FY 2024-25 व्यापार आंकड़े, FY 2024-25 FDI प्रवाह
- IBEF — विदेश व्यापार नीति और आंकड़े
- यूरोपीय आयोग — भारत के साथ EU के व्यापार संबंध
- बिज़नेस स्टैंडर्ड — भारत-अफ्रीका व्यापार 2024-25 में 100 अरब डॉलर के पार
- आउटलुक बिज़नेस — भारत-UAE CEPA से व्यापार 100 अरब डॉलर के पार
