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हमले के डर से ईरान ने 500 किलो बम ग्रेड यूरेनियम को छिपा दिया, अब उसे निकालना लगभग नामुमकिन – AajTak

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अमेरिकी खुफिया विभाग से जुड़े सूत्रों ने बताया है कि ईरान ने हाल के हफ्तों में अपने बम बनाने योग्य यूरेनियम के विशाल भंडार को पूरी तरह से सील करने के लिए आक्रामक कदम उठाए हैं. ईरान ने जानबूझकर उन भूमिगत सुरंगों को ढहा दिया है जहां यह यूरेनियम रखा था. उनके प्रवेश द्वारों पर बारूदी सुरंगें बिछा दी हैं. 
ईरान ने यह कदम तब उठाया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिकी सेना को इस यूरेनियम को जब्त करने का आदेश दिए जाने की अटकलें तेज थीं. ईरान की इस सैन्य घेराबंदी ने अब अमेरिका और ईरान के बीच चल रही परमाणु वार्ताओं को एक बेहद पेचीदा मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है.
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ट्रंप की धमकी और ईरान की जवाबी कार्रवाई
पिछले कुछ महीनों से दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिए थे कि अमेरिकी सेना ईरान के परमाणु ठिकानों पर कार्रवाई करके इस यूरेनियम भंडार को अपने कब्जे में ले सकती है. अमेरिका का मुख्य उद्देश्य इस सामग्री को जब्त करना है ताकि ईरान परमाणु हथियार न बना सके. 
iran hide 500 kg Highly Enriched Uranium
ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद किए जाने के बाद से क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है, जिसे फिर से खुलवाना ट्रंप प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है. लेकिन ट्रंप की इसी सार्वजनिक बयानबाजी ने ईरान को सतर्क कर दिया.
जानकारों का मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा संभावित सैन्य हमले की बात खुलकर करने की वजह से ही ईरान को अपने इस सबसे कीमती परमाणु एसेट को जमीन के नीचे और गहरे दफनाने तथा सुरक्षित करने की प्रेरणा मिली.
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समझौते की राह में खड़ी हुई नई मुश्किलें
ईरान की इस नई किलेबंदी ने ट्रंप प्रशासन के उस प्रस्तावित समझौते पर पानी फेरने का जोखिम पैदा कर दिया है, जिसके तहत तेहरान को अपना सारा समृद्ध यूरेनियम अमेरिका को सौंपना था. अमेरिकी योजना के अनुसार, लगभग आधा टन (500 किलोग्राम) से अधिक बम ग्रेड यूरेनियम को ईरान के ठिकानों पर ही नष्ट किया जाना था. फिर उसके अवशेषों को देश से बाहर ले जाना था. 
एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने बताया था कि दोनों देश इस सौदे के बेहद करीब पहुंच चुके हैं, लेकिन अब इन सुरंगों के ढहाए जाने और वहां बारूदी सुरंगें बिछाए जाने से यह काम लगभग असंभव और जानलेवा हो गया है. 
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विशेषज्ञों का कहना है कि अब यदि दोनों देशों के बीच कोई लिखित समझौता हो भी जाता है, तो भी इस खतरनाक सामग्री को जमीन के नीचे से सुरक्षित बाहर निकालने का जोखिम भरा काम कौन और कैसे करेगा, यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है.
ईरान को मिल सकता है हेरफेर का मौका
परमाणु विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की इस हरकत के पीछे एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल भी हो सकती है. नेशनल न्यूक्लियर सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन (NNSA) के पूर्व अधिकारी स्कॉट रोएकर के अनुसार, यदि अंतरराष्ट्रीय वार्ताकार ईरान से यह मांग करते हैं कि वह जांच और नष्ट करने के लिए अपने पूरे यूरेनियम भंडार को किसी एक केंद्रीय स्थान पर लाए, तो यह पूरी जिम्मेदारी ईरान की होगी. 
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सुरंगों के ब्लॉक होने की आड़ में ईरान यह बहाना बना सकता है कि यूरेनियम का कुछ हिस्सा अब पूरी तरह से न मिलने लायक हो चुका है. उसे बाहर निकालना मुमकिन नहीं है. ऐसी स्थिति में अमेरिका या अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) कभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पाएगी कि ईरान ने वास्तव में अपना सारा यूरेनियम सौंप दिया है या भविष्य के लिए कुछ हिस्सा छिपाकर रख लिया है.
कहां छिपा है यूरेनियम और क्या थी अमेरिकी सेना की योजना?
अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ईरान के इस अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम का अधिकांश हिस्सा मध्य ईरान में स्थित इस्फहान परमाणु परिसर की भूमिगत सुरंगों में दबा हुआ है, जबकि कुछ हिस्सा अन्य गुप्त ठिकानों पर है. मई के मध्य में ही अमेरिकी सेना इस परमाणु सामग्री को जबरन जब्त करने के लिए एक बड़ा सैन्य ऑपरेशन शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार थी.
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ऐन वक्त पर इस ऑपरेशन को हाई रिस्क वाला मानकर टाल दिया गया. राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद फॉक्स न्यूज पर एक इंटरव्यू के दौरान माना था कि इस यूरेनियम को बलपूर्वक निकालना बेहद खतरनाक है. हालांकि, उन्होंने दावा किया था कि अमेरिकी खुफिया तंत्र की नजरों से बचकर ईरानी अधिकारी भी इस दबे हुए मलबे से यूरेनियम नहीं निकाल सकते.
विशेषज्ञों के लिए भी टेढ़ी खीर बना परमाणु मिशन
इस यूरेनियम को बाहर निकालने और नष्ट करने का काम कितना जटिल है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके लिए अमेरिका को टेनेसी स्थित ‘ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी’ द्वारा तैयार की गई एक विशेष मोबाइल यूरेनियम सुविधा को ईरान में तैनात करना होगा. 
हाल ही में ट्रंप के करीबी वार्ताकारों ने इस प्रयोगशाला का दौरा भी किया था. लेकिन अब जब सुरंगें मलबे और बारूदी सुरंगों से अटी पड़ी हैं, तो दुनिया के सबसे बड़े परमाणु विशेषज्ञों को भी भारी उत्खनन उपकरणों और बम निरोधक दस्तों के साथ हफ्तों तक जान हथेली पर रखकर काम करना होगा. 
ट्रंप ने पहले कहा था कि इस काम में कम से कम दो हफ्ते लगेंगे, लेकिन वर्तमान जमीनी हकीकत को देखते हुए अब इस तकनीकी मिशन को पूरा करने में महीनों का समय लग सकता है.
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IndiaPrime Hindi

Devender Singh is a senior journalist and media professional with over two decades of experience in television, digital, and Hindi-language journalism. He began his career with ETV Hindi in 2000 and has since served as Bureau Chief for several prominent news networks, including India News, Sahara Samay, and Bharat Express. Throughout his career, he has reported on several high-impact stories, including tribal starvation deaths, the Asaram case, the Jaipur serial bomb blasts, and numerous crime, political, and social issues that earned him recognition as a credible and influential journalist across India. Beyond television journalism, Devender Singh has contributed significantly to digital media transformation, Hindi journalism innovation, and AI-driven Hindi language initiatives. He has also served as a media and communication advisor to several prominent individuals, organizations, and institutions. Holding a postgraduate degree in Journalism along with a degree in Law, he continues to write and analyze issues related to governance, public policy, technology, politics, and social development, delivering insightful and fact-based content to readers.

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