IndiaPrimeTV.com लखीमपुर खीरी की कहानी पर कोर्ट भी हैरान, जानिए देशभर में मालखानों से गायब हुए सबूतों के बड़े मामले
देवेंद्र सिंह | IndiaPrimeTV.com लखीमपुर खीरी सोना मामला क्या बारिश के पानी में सोना गल सकता है? क्या बंदर करोड़ों रुपये के गहने उठाकर ले जा सकते हैं? उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी से सामने आए एक मामले में पुलिस ने अदालत के सामने कुछ ऐसा ही दावा किया, जिसे सुनकर जज भी हैरान रह गए।
लखीमपुर खीरी की जिला अदालत ने पुलिस की इस दलील को न केवल खारिज कर दिया, बल्कि इसे गंभीर लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार का मामला मानते हुए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और पीड़ित को मुआवजा देने का आदेश भी दिया।
यह मामला सिर्फ एक परिवार के गहनों का नहीं है, बल्कि देशभर के पुलिस मालखानों में रखी जब्त संपत्तियों की सुरक्षा और पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े करता है।
लखीमपुर खीरी सोना मामला क्या है पूरा मामला?
यह मामला लखीमपुर खीरी के सदर कोतवाली क्षेत्र का है। वर्ष 2007 में कपूरथला मोहल्ले में एक महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। जांच के दौरान पुलिस ने महिला के शरीर से सोने की चेन, लॉकेट, अंगूठी और 10 सोने की चूड़ियां बरामद कर मालखाने में जमा कर दी थीं।लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने महिला के पति मुदित अग्रवाल को बरी कर दिया। इसके बाद उन्होंने जब्त गहनों को वापस पाने के लिए अदालत में आवेदन किया।
अदालत ने पुलिस को गहने वापस करने का आदेश दिया, लेकिन इसके बाद जो जवाब आया, उसने पूरे मामले को चर्चा का विषय बना दिया।
पुलिस की दलील: बारिश में गल गया सोना, बंदर उठा ले गए गहने
पुलिस ने अदालत को बताया कि मालखाने में रखी सीलबंद पोटली बारिश के पानी में भीग गई थी। उसे सुखाने के लिए छत पर रखा गया, जहां कथित तौर पर अधिकांश सोना गल गया और जो कुछ बचा था, उसे बंदर उठाकर ले गए।
पुलिस की इस दलील पर अदालत ने कड़ी नाराजगी जताई।
अदालत ने क्या कहा?
जिला जज लक्ष्मीकांत शुक्ल ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि सोना पानी से नष्ट नहीं होता। अदालत ने पुलिस की कहानी को पूरी तरह अविश्वसनीय और तथ्यहीन बताया।अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि मालखाने में जमा गहनों का दुरुपयोग किया गया या उन्हें गायब कर दिया गया।
कोर्ट ने आदेश दिया कि:
- उस अवधि में मालखाने की जिम्मेदारी संभालने वाले पुलिसकर्मियों की पहचान की जाए।
- दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए।
- पीड़ित को उसके नुकसान की भरपाई की जाए।
- मुआवजे की राशि जिम्मेदार अधिकारियों से वसूली जाए।
एक साल बाद भी नहीं मिला न्याय
अदालत के आदेश को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन पीड़ित परिवार को न तो गहने वापस मिले हैं और न ही कोई मुआवजा।
परिवार का आरोप है कि उन्होंने कई बार पुलिस और जिला प्रशासन से संपर्क किया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब वे इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं।
मालखाना क्या होता है और इसकी जिम्मेदारी किसकी होती है?
पुलिस थानों में मालखाना वह स्थान होता है, जहां जांच के दौरान बरामद किए गए सामान, सबूत, नकदी, गहने, वाहन, हथियार और अन्य वस्तुएं सुरक्षित रखी जाती हैं।
इनकी देखरेख की जिम्मेदारी निर्धारित पुलिस अधिकारियों की होती है। हर वस्तु का रिकॉर्ड रजिस्टर में दर्ज किया जाता है और अदालत के आदेश के बाद संबंधित व्यक्ति को वापस किया जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल रिकॉर्ड, सीसीटीवी निगरानी और नियमित ऑडिट के अभाव में कई राज्यों के मालखाने भ्रष्टाचार और लापरवाही के केंद्र बन गए हैं।
देशभर में मालखानों से गायब हुए सामान के चर्चित मामले
लखीमपुर खीरी का मामला पहला नहीं है। इससे पहले भी देश के कई राज्यों में मालखानों से जब्त संपत्ति गायब होने के मामले सामने आ चुके हैं।
बिहार: शराबबंदी के बाद ‘चूहे पी गए शराब’
बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद पुलिस ने बड़ी मात्रा में जब्त शराब मालखानों में रखी थी। कई जिलों में शराब गायब होने पर पुलिस ने दावा किया कि चूहे शराब पी गए।
यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना और अदालतों ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
तमिलनाडु: थाने से गायब हुए सोने के गहने
तमिलनाडु में कई मामलों में जब्त किए गए सोने के गहने मालखानों से गायब होने की शिकायतें सामने आईं। जांच के दौरान कुछ पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई।
महाराष्ट्र: मादक पदार्थों की हेराफेरी के आरोप
महाराष्ट्र में जब्त किए गए मादक पदार्थों के संरक्षण और नष्ट करने की प्रक्रिया को लेकर कई बार सवाल उठ चुके हैं। अदालतों ने सबूतों के सुरक्षित रखरखाव पर सख्त निर्देश जारी किए हैं।
दिल्ली: जब्त वाहनों के रखरखाव पर सवाल
राजधानी दिल्ली में हजारों जब्त वाहन वर्षों तक खुले मैदानों में पड़े रहने के कारण नष्ट हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट कई बार पुलिस को ऐसी संपत्तियों के त्वरित निस्तारण के निर्देश दे चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट क्या कह चुका है?
सुप्रीम Court ने कई मामलों में कहा है कि पुलिस थानों में जब्त संपत्तियों को लंबे समय तक रखने के बजाय उनकी समयबद्ध नीलामी, वापसी या निस्तारण की व्यवस्था होनी चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा है कि मालखानों का डिजिटलीकरण और नियमित निरीक्षण आवश्यक है, ताकि सबूतों और कीमती सामान की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
विशेषज्ञों की राय
पूर्व पुलिस अधिकारियों का कहना है कि देशभर में आधुनिक “ई-मालखाना” प्रणाली लागू करने की जरूरत है।
इसके तहत:
- हर वस्तु का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाए।
- बारकोड या क्यूआर कोड आधारित ट्रैकिंग हो।
- 24 घंटे सीसीटीवी निगरानी रखी जाए।
- समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए।
- अदालतों के साथ रिकॉर्ड को ऑनलाइन जोड़ा जाए।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
लखीमपुर खीरी का मामला केवल एक परिवार के गहनों के गायब होने तक सीमित नहीं है। यह सवाल उठाता है कि यदि पुलिस की निगरानी में रखे गए सबूत और कीमती सामान सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिक न्याय व्यवस्था पर कैसे भरोसा करेगा?
यह मामला बताता है कि तकनीक और जवाबदेही के बिना पुलिस मालखानों की मौजूदा व्यवस्था में सुधार की तत्काल आवश्यकता है।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि अदालत के आदेश के बाद दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है और पीड़ित परिवार को कब न्याय मिलता है।
