“जम्मू-कश्मीर में जल्द खिलेगा कमल” : भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन
इंडिया प्राइम पॉलिटिकल डेस्क | नई दिल्ली/श्रीनगर “जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनेगी, यह केवल समय की बात है।” भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का इस बयान ने राजनीतिक हल्को में तुफान उठा दिया है। बयान के क्या मायने है इसका आकलन बीजेपी ,संघ और कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियां, बंगाल में तृणमुल और पंजाब की आप पार्टी में टूट के उदाहरणो से जोड़ कर देख रहे है।
नितिन नवीन डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125 वी जयंती कार्यक्रम में कश्मीर आए थे। कश्मीर सरकार के लिए चिंता इसलिए भी है क्योंकि बीेजेपी की नीव रखने वाले डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गृह राज्य बंगाल में बीजेपी सरकार बना चुकी है और देशभर में बीजेपी नेताओ के बयानो में अब एक देश दो निशान दो विधान दो प्रधान वाले बयान को हवा दी जा रही है। इन्ही बयानो से कश्मीर का तल्लुक है और बीजेपी पार्टी अध्यक्ष के बयानों के पीछे का सच जानने को उत्सुक है।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC)-कांग्रेस गठबंधन सत्ता में है और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सरकार चला रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे है कि क्या भाजपा यहां भी कोई राजनीतिक ड्रामा को हवा तो नही दे रही। हालाकिं उमर और कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टीयों सवाल और आधार पूछ रही है कैसे आखिर बीजेपी भविष्य में सरकार बनाने का दावा कर रही है?
उमर अब्दुल्ला सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती : अपनी ही पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति
नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार बनने के कुछ ही महीनों बाद से ही पार्टी के भीतर कई स्तरों पर असंतोष सामने आने लगा है। यह असंतोष केवल मंत्री पदों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैचारिक, संगठनात्मक और राजनीतिक स्तर पर भी दिखाई दे रहा है।
1. अनुच्छेद 370 और राज्य का दर्जा : सबसे बड़ा वैचारिक विवाद
नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता और श्रीनगर से सांसद आगा रुहुल्लाह मेहदी ने सार्वजनिक रूप से पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि चुनाव के दौरान अनुच्छेद 370 की बहाली और पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के जो वादे किए गए थे, सत्ता में आने के बाद सरकार उस मुद्दे पर अपेक्षित राजनीतिक आक्रामकता नहीं दिखा रही।
उन्होंने कई मौकों पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व पर भी तीखी टिप्पणी की है। राजनीतिक जानकार इसे पार्टी के भीतर उभरती वैचारिक दरार का संकेत मानते हैं।
2. कैबिनेट विस्तार और मंत्री पदों की नाराजगी
सरकार बनने के बाद सीमित मंत्रिमंडल और विभागों के बंटवारे को लेकर कई विधायक असंतुष्ट बताए जाते हैं। कई ऐसे विधायक और समर्थक समूह हैं जिन्हें उम्मीद थी कि उन्हें सरकार में अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा।
कैबिनेट विस्तार में लगातार देरी ने इस असंतोष को और बढ़ाया है। विपक्ष भी इसी मुद्दे को लगातार उठा रहा है।
3. निर्दलीय विधायकों की भूमिका
सरकार गठन के समय कई निर्दलीय विधायकों ने नेशनल कॉन्फ्रेंस को समर्थन दिया था। राजनीतिक हलकों में समय-समय पर यह चर्चा होती रही है कि यदि भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं तो इन विधायकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि फिलहाल समर्थन वापस लेने जैसी कोई आधिकारिक स्थिति सामने नहीं आई है।
4. कांग्रेस-एनसी गठबंधन की चुनौतियां
सरकार गठबंधन की है, लेकिन दोनों दलों के बीच समय-समय पर समन्वय को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कुछ कांग्रेस नेताओं ने सार्वजनिक रूप से गठबंधन को लेकर असंतोष भी व्यक्त किया है।
हाल की कुछ राजनीतिक बैठकों में कांग्रेस की भागीदारी को लेकर भी चर्चाएं हुईं, जिससे गठबंधन के भीतर संवाद की स्थिति पर सवाल उठे।
भाजपा की रणनीति क्या है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की रणनीति तत्काल सरकार गिराने की नहीं, बल्कि अगले कुछ वर्षों में राजनीतिक समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ने की है। इसके लिए पार्टी एक साथ कई मोर्चों पर काम कर रही है—सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर उभरते मतभेदों पर नजर, कश्मीर घाटी में संगठन विस्तार, विकास आधारित राजनीतिक नैरेटिव और 2029 के विधानसभा चुनाव की तैयारी।
भाजपा फिलहाल सरकार गिराने की जल्दबाजी में दिखाई नहीं देती। पार्टी का पूरा फोकस दीर्घकालिक राजनीतिक विस्तार पर है।
कश्मीर घाटी में संगठन विस्तार
भाजपा अब केवल जम्मू क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी घाटी में बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने, नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने और स्थानीय नेतृत्व तैयार करने पर काम कर रही है।
विकास आधारित राजनीतिक संदेश
भाजपा लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि जम्मू-कश्मीर में विकास, आधारभूत संरचना, पर्यटन, निवेश, सड़क, रेल और रोजगार जैसे मुद्दे भविष्य की राजनीति तय करेंगे।
इसी रणनीति के तहत केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों तक राजनीतिक पहुंच बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
स्थानीय नेतृत्व तैयार करना
पंचायती राज संस्थाओं, स्थानीय निकायों और युवा नेतृत्व के माध्यम से भाजपा अपना सामाजिक आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
भाजपा की संभावित रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 2029 का चुनाव भाजपा के लिए निर्णायक माना जा सकता है।
संभावित रणनीतियां:
- कश्मीर घाटी में सीटों की संख्या बढ़ाना।
- जम्मू क्षेत्र में मौजूदा आधार को बनाए रखना।
- विकास और सुशासन को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाना।
- स्थानीय नेतृत्व को आगे लाना।
- विपक्षी दलों के भीतर असंतोष का राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास करना।
- केंद्र सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों तक सीधा संपर्क बढ़ाना।
क्या सरकार पर तत्काल खतरा है?
वर्तमान विधानसभा गणित को देखते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन के पास बहुमत है। इसलिए तत्काल सरकार बदलने की संभावना स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती।
हालांकि राजनीति में परिस्थितियां लगातार बदलती रहती हैं। यदि भविष्य में गठबंधन सहयोगियों, निर्दलीय विधायकों या पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ता है, तो राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। फिलहाल ऐसी किसी भी संभावना पर निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
राजनीतिक तस्वीर
भाजपा का वर्तमान फोकस केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि कश्मीर घाटी में दीर्घकालिक राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाना है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी और गठबंधन को एकजुट बनाए रखना, राज्य का दर्जा जैसे प्रमुख मुद्दों पर राजनीतिक अपेक्षाओं का संतुलन साधना और प्रशासनिक प्रदर्शन को मजबूत करना है।
इसी कारण 2029 का विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की नई राजनीतिक दिशा तय करने वाला चुनाव भी माना जा रहा है।
इंडिया प्राइम विश्लेषण
भाजपा की रणनीति फिलहाल “सरकार गिराओ” से अधिक “राजनीतिक जमीन तैयार करो” पर केंद्रित दिखाई देती है। वहीं नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए सबसे बड़ी परीक्षा विपक्ष नहीं, बल्कि अपने संगठन के भीतर उभरती असहमति और गठबंधन की एकजुटता बनाए रखना होगी। यदि उमर अब्दुल्ला इन चुनौतियों का प्रभावी समाधान निकालते हैं तो 2029 का मुकाबला अधिक संतुलित हो सकता है। दूसरी ओर यदि आंतरिक मतभेद गहराते हैं, तो भाजपा को अपने विस्तार का अवसर मिल सकता है। अंतिम राजनीतिक परिणाम मतदाताओं, चुनावी मुद्दों और उस समय की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

